Page 191 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मने सुरन्ि कुमार को गल लगाया और कहा, "तुम्हार भाई की पीएचडी
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उपामध ममलने स जो खुशी हुई थी, उसस कहीं ज़्यादा खुशी हम तुम्हार त्याग
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और इस गौरवशाली जीवन को करीब स देखकर हुई है। तुम असली हीरो हो।"
सुरन्ि कुमार ने मुस्कुराकर हम मवदा मकया।
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जब हमारी रन वापस अपने गंतव्य की ओर बढ रही थी, तो मखडकी
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स अमृतसर की रोशनी धीर-धीर धुंधली हो रही थी। मर मन म 18 से 20 मदसंबर
तक की यात्रा एक मर्फल्म की तरह चल रही थी।
1. 18 मदसंबर: मदल्ली—व्यमिगत उपलमब्ध (पीएचडी उपामध)।
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2. 19 मदसंबर: स्वण मंमदर—आमत्मक शांमत (मवनम्रता और अध्यात्म)।
3. 19 मदसंबर: वाघा बॉडर—राष्रीय गौरव (देशभमि और शौयष)।
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मने महसूस मकया मक मरी पीएचडी की उपामध अब कवल 'मशक्षा क
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क्षेत्र में नवाचार' तक सीममत नहीं थी, बमल्क इसका उद्देश्य देश क मलए मवनम्रता,
त्याग और प्रेम की भावना से काम करना था।
यह कहानी मेरी आत्मकथा का सबसे रोचक और यादगार महस्सा है,
जहााँ मेरी शैक्षमणक सफलता को, देश की सेवा और अध्यात्म क मवशाल फलक
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पर रखकर, उस वास्तमवक और मानवीय अथष प्राप्त हुआ। इस यात्रा ने मुझ कवल
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'डॉक्टर' नहीं बनाया, बमल्क एक बहतर इंसान बनने की प्रेरणा दी।
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