Page 195 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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मफर शुऱू हुआ वह जुलूस, जो मेरी आत्मकथा का सबसे गौरवशाली
क्षण बन गया।
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मेर भाई कुमर मसंह ने मुझ एक सजी हुई खुली जीप या रॉली पर मबठाया।
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बैंड बाजे वाले आगे-आगे चल रहे थे, एक क बाद एक देशभमि और उल्लास
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क गीत बजात हुए। मने चारों ओर देखा—मर हाथों म फूलों क कई हार पहनाए
गए थे .
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जुलूस पूर गााँव बरदु म घुमाया गया। हर गली, हर नुक्कड पर लोग अपने
घरों से बाहर मनकलकर खड थे। छोटे-छोटे बच्चे तामलयााँ बजा रहे थे, और बुजुग ष
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अपनी पारंपररक पगमडयााँ महलाकर आशीवाषद दे रहे थे।
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जब हम गााँव क मुख्य चौक स गुज़र, तो गााँव क सभी सम्मामनत
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ररश्तेदारों और दोस्तों ने रुककर मेरा स्वागत मकया। यह क्षण कवल मेरी पीएचडी
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का उत्सव नहीं था; यह बरदु गााँव क बट की वापसी का जश्न था।
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हर कदम पर म महसूस कर रहा था मक यह जुलूस कवल मर सम्मान म ें
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नहीं, बमल्क उन सभी कमठनाइयों और त्याग क सम्मान में था, जो बरदु क हर
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घर क लोग करते हैं, तामक उनक बच्चे सफलता पा सक। मेर भाइयों ने अपनी
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आाँखों क सामने मुझ, अपने छोट भाई को, गााँव क गौरव क ऱूप में प्रमतमष्ठत होते
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देखा, और उनकी खुशी का मठकाना नहीं था।
माताजी का आशीवाषद—समपषण की पूणषता
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जुलूस वापस हमार घर पर आकर रुका। घर क दरवाज़ पर, दुमनया की
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सबस महत्वपूण हस्ती मरा इंतज़ार कर रही थी—मेरी माताजी (श्रीमती कशर
बाई ठाक ु र)।
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मेरी मााँ, जो मेर जीवन की सबसे बडी प्रेरणा हैं, आज खुशी स मुस्कुरा
रही थीं, लेमकन उनकी आाँखों में एक अजीब सी नमी थी। वह नमी, वर्ों क
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