Page 200 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                                                            े
              कोई चुपचाप उनक पैर सहला रहा था, कोई उनका माथा, और कोई बस उनक
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              पास बैठकर रो रहा था।
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                     उस रात, हमारी मााँ क कमर म अजीब सी शांमत थी—वह शांमत, जो
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              तूर्फान स पहल आती है। हम सब एक-दूसर स कोई बात नहीं कर पा रहे थे,
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              लेमकन हम एक-दूसर क दुुःख को गहराई स महसूस कर रहे थे।
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                     मैंने अपनी माताजी क हाथों को अपने हाथ में मलया। वे हाथ, मजन्होंने
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              मुझ और मर भाइयों को मपता क मनधन क बाद इस लायक बनाया था मक म   ैं
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                                                                   े
              आज 'डॉक्टर' कहला सकू। उन्होंने अपने त्याग और संघर् स पूर पररवार को
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                                   ाँ
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              पाल-पोसकर बडा मकया था।
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                     म झुककर उनक कान म धीर स फुसफुसाया, "मााँ, म आ गया ह ाँ। हम
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              सब यहााँ हैं। आप ठीक हो जाओगी।"
                     वह उस समय बोलने की मस्थमत में नहीं थीं, लेमकन उन्होंने आाँखें खोलीं
              और हम सबको देखा। उनकी नज़र हम सब पर एक-एक करक मटकीं—मवक्रम,
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              गजराज, मानमसंह, कुमर, सुमर, और मुझ पर, और हमारी बहनों पर। उनकी
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              आाँखों की वह दृमि—वह अंमतम दृमि—प्यार, संतोर् और एक मौन मवदाई का
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              संदेश थी। उस पल मुझ एहसास हुआ मक वह जानती थीं मक उनका समय आ
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              गया है। उनका सबस बडा संतोर् यह था मक वह हम मफर स एक साथ देख पाई ं ।
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                                          आधारस्तंभ का ढहना—27 मदसंबर 2019
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                     27 मदसंबर 2019, सुबह: सुबह हुई, पर सूरज की रोशनी म कोई
              उल्लास नहीं था। हमार घर में डॉक्टर और नसष लगातार उनकी देखभाल कर रहे
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              थे, लेमकन हम सब जानते थे मक अब मकसी दवाई का असर नहीं होगा।
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