Page 201 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                     हम सब माताजी क कमर म ही थे। हम सबने ममलकर सुबह की पूजा
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              की और उनकी लंबी उम्र क मलए प्राथषना की, पर शायद मनयमत को कुछ और
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              ही मंजूर था।
                     27  मदसंबर  2019,  लगभग  11:30  बजे:  तभी,  माताजी  की  सााँसें
              अचानक और भी धीमी होने लगीं।

                     मेरा सबसे छोटा भाई सुमेर  मसंह और मेरी बहनें रोने लगीं। हम सभी
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              भाई, जो जीवन क बड-से-बड संघर् म मज़बूती स खड रहे, आज असहाय थे।
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                     ठीक 11:30 बजे क आसपास, हमारी माताजी ने अंमतम सााँस ली।
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              उनक चेहर पर एक शांमत थी—वह शांमत, जो जीवन भर क संघर् क बाद ममलती
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              है।
                     हमारा पररवार, जो मपताजी क जाने क बाद माताजी क कारण एक
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              अटूट इकाई बना हुआ था, आज टूट गया।
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                     पूर कमर म एक गहरा सन्नाटा छा गया, मजसक बाद हमारी बहनों क
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              रुदन की आवाज़ गूज उठी—वह रुदन, जो मदल क सबसे गहर घाव से आता है।
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                     मने अपनी आख बंद कर लीं। मर मन म एक ही मवचार आया: "हम
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              अनाथ हो गए।" मपताजी बचपन में स्वगष मसधार गए थे, और आज माताजी भी
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              चली गई ं । हमार जीवन का वह आधारस्तंभ ढह चुका था, मजस पर हमने ज्ञान,
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              संस्कार और संघर् का महल खडा मकया था। अब हम मसर्फ एक-दूसर का सहारा
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              बनना था।
                                       बरदु का शोक और हजारों लोगों का सलाब
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                     गााँव में खबर आग की तरह फल गई। यह कवल पटल  पररवार का
              दुुःख नहीं था; यह बरदु गााँव की मााँ का जाना था। मेरी माताजी ने अपने
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