Page 205 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                                  ैं
                                                                  े
                                                                        े
              की, लेमकन एक डर हमेशा बना रहता था। मने तय मकया मक मुझ सबस पहल  े
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                                                े
                                                                   े
                                                                  े
              अपने दोस्त, डॉ. गौक ु ल नागर, स सलाह लनी चामहए। डॉ. नागर मर पुराने साथी
              और एक अत्यंत अनुभवी मचमकत्सक हैं।
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                     जब मैं उनक पास गया, तो मेर चेहर क भावों और लक्षणों को देखकर
              उन्होंने तुरंत मस्थमत की गंभीरता को भााँप मलया।
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                     डॉ. गौकुल नागर ने गंभीरता स कहा, "सर, यह सामान्य बुखार नहीं
              लग रहा। आप  जानते हो बाहर क्या चल रहा है।आप  तुरंत कुछ ज़ऱूरी जााँच
              करा लो। खासकर सीआरपी (C-Reactive Protein) की जााँच ।"


                                                              सीआरपी      का
                                                              मवस्फोट    और

                                                              सााँसों की चुनौती
                                                                          डॉ.

                                                              गौकुल  नागर  की
                                                              सलाह  पर,  मैंने

              जााँच कराई। जब ररपोट मेर हाथ में आई, तो मेर पैरों तले ज़मीन मखसक गई।
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                     सीआरपी (शरीर म सूजन का संकतक) का स्तर बहुत बढा हुआ 104
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              आया था। यह इस बात का स्पि संकत था मक मर शरीर म वायरस ने एक गंभीर
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                                                                     ष
              युद् छड मदया है और मरा शरीर उस लडाई म मपछड रहा है। यह ररपोट मेर मलए
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                                                                        े
                                                  ें
              एक अलामष थी।
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                                                                   े
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                     अगले ही मदन, मरी हालत और तज़ी स मबगडने लगी। मुझ सबस बडी
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              मदक्कत महसूस हुई—सााँस लेने में । यह वो क्षण था, जब सारा डर हकीकत में
              बदल गया। मेर फफड, मरी मज़ंदगी का इंजन, जवाब देने लगे थे।
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