Page 207 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              और तामकक सहारा था। डॉ. शलन्ि ठाकुर न कवल एक उत्कृि डॉक्टर थे,
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              बमल्क पाररवाररक संबंध क कारण म उन पर आख बंद करक भरोसा कर सकता
              था।
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                     जस ही म देवास क उनक अस्पताल पहुाँचा, डॉ. शलन्ि ठाकुर ने तुरंत
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              मरी गंभीरता को समझा और मबना एक पल गवाए, मेरा इलाज सुरु करमदया।
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                     डॉ.  शलन्ि  ठाकुर  ने  अत्यंत  मवशर्ज्ञता  मदखात  हुए,  अमलतास
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              अस्पताल क मेन डॉ. सोनगरा जी से मनयममत ऱूप से परामसष मकया और उनक
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              मदशा-मनदेशों क अनुसार मरा पूरा इलाज मकया। इस संयुि प्रयास ने मुझ यह
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              मवश्वास मदलाया मक म सही हाथों म ह ाँ।
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                                      त्याग और संघर्ष का मत्रकोण—डली ड्यूटी
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                     इलाज शुऱू हो गया था, लेमकन अस्पताल में भती होने की बजाय, मुझ  े
              दैमनक मचमकत्सा और देखभाल क मलए टोंक खुदष से देवास तक की दैमनक यात्रा
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              करनी पडती थी। यह यात्रा, और अस्पताल में मदनभर रहना, ही मरी संघर्मय
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              कहानी का सबसे माममषक महस्सा है।
                     इस दुुःख की घडी म, मेर मलए तीन व्यमि मेर जीवन क सारथी बने:
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                  1.  सुमेर मसंह ठाक ु र (छोटा भाई): वह मेर साथ हर पल साये की तरह रहा।
                  2.  सुनील मसंह ठाक ु र (भांजा): वह मरा एक और मज़बूत सहारा था।
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                  3.  दीपेन्ि ठाक ु र : मर साल दीपेन्ि ने भी इस संघर् म कोई कसर नहीं
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                     छोडी।
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                     ये तीनों लोग—मेरा भाई, भांजा और साला—हर रोज़ सुबह मर साथ
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              टोंक खुदष स देवास क मलए मनकलत थे। पूरा मदन अस्पताल म, कोमवड क ख़तर  े
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              क बीच, मेरी देखभाल करते थे, मेर पास बैठते थे, और मेरी महम्मत बाँधाते थे।
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