Page 208 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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शाम को जब मदन की दवाइयााँ और उपचार पूर हो जात थे, तब हम सब रात को
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वापस टोंक खुदष लौटते थे।
यह मसलमसला एक-दो मदन का नहीं, बमल्क हफ्तों तक चला। हर रोज़
कोमवड-19 क भयावह माहौल में अस्पताल जाना, संक्रमण का खतरा उठाना,
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और रात-मदन मेरी सेवा में लगे रहना—यह त्याग मकसी भी पुरस्कार या सम्मान
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से बडा है। व जानत थे मक मरी माताजी जा चुकी हैं, और अब पररवार को जोडने
का मज़म्मा हम भाइयों पर है, और इसमलए व मरी मज़ंदगी बचाने क मलए अपनी
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जान जोमखम में डाल रहे थे।
मनुःस्वाथष सेवा—पत्नी और भतीजी का कवच
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जब म और मर सारथी देवास म संघर् कर रहे थे, तब घर पर भी दो
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देमवयााँ मरी सवा म जुटी थीं:
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1. श्रीमती माता ठाक ु र (सोनू ठाक ु र) - मेरी धमषपत्नी: मेरी पमत्न ने इस
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दौरान बहुत सवा मक। कोमवड क डर से, जब लोग अपनों स दूर भाग
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रहे थे, मरी पत्नी ने मबना मकसी संकोच क मरी और पररवार की
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देखभाल की। मेरा उपचार चल रहा था, लेमकन घर पर मेर मलए काढा
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बनाना, पौमिक भोजन तैयार करना, और खुद को संक्रममत होने स े
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बचात हुए मेरी दवाइयों का ध्यान रखना—यह सब उन्होंने एक सैमनक
की दृढता और एक मााँ क स्नेह से मकया। उनकी मनस्वाथष सेवा और मेरी
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मचंता म उनका हर पल मबताना, मेर मलए सबसे बडी दवा थी।
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2. लमलता ठाक ु र (भतीजी): मेरी भतीजी लमलता ठाक ु र ने भी इस सेवा में
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अपनी महत्वपूण भूममका मनभाई। युवा होने क बावजूद, उन्होंने पूरी
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मजम्मेदारी क साथ घर क काम में और मेरी देखभाल में सहयोग मकया।
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