Page 213 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              अस्पताल क गमलयार, दवाइयों की गंध और उनक कमजोर होत हाथ—वो
              समय हमार पररवार क मलए मकसी अमग्नपरीक्षा से कम नहीं था। नीरज, माया,
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              रानू और लमलता—उनक चारों बच्चों ने अपनी मााँ की सेवा में कोई कसर नहीं
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              छोडी। मवशर्कर नीरज क मलए तो उनकी मााँ ही उनका संसार थी।
                     10 मदसंबर 2023: वो काला रमववार समय का पमहया रुकता नहीं, पर
              उस मदन जैसे ठहर सा गया था। 10 मदसंबर 2023, रमववार का वो मदन मरी स्मृमत
                                                                      े
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              म हमशा क मलए दज हो गया। सदी की उस सुबह म एक ऐसी खबर आई मजसने
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              हमार पैरों तल स जमीन मखसका दी। भाभी मााँ हम अकला छोडकर उस अनंत
              यात्रा पर मनकल पडीं, जहााँ से कोई वापस नहीं आता।
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                     जब मने उनका शांत चेहरा देखा, तो लगा जैसे वो अभी बोल पडगी—
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              "अनार, आ गए तुम?" पर वहााँ मसफ सन्नाटा था। भाई साहब गजराज मसंह जी
              की आंखों का वो सूनापन और बच्चों की मससमकयााँ आज भी कान म गूंजती
                                                                       ें
              हैं। ममता तो जैसे पत्थर सी हो गई थी, उसका तो जैसे मायका ही उजड गया था।
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                     मवरासत और यादें आज भाभी मााँ हमार बीच नहीं हैं, लेमकन उनक
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              संस्कार नीरज, माया, रानू और लमलता क ऱूप म जीमवत हैं। उन्होंने मसखाया मक
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              पररवार को जोडकर कस रखा जाता है। उनकी कमी को कोई शब्द पूरा नहीं कर
              सकता। वे मेरी आत्मकथा का वह मौन अध्याय हैं, मजसे पढते समय आाँख  ें
              हमेशा नम रहेंगी।
                     ममता का आाँचल और संघर्ष की लौ
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                     बीमारी का वो लंबा और धैयषपूणष सफर भाभी मााँ का शरीर धीर-धीर  े
              बीमारी की मगरफ्त में आ रहा था, लेमकन उनकी इच्छाशमि महमालय जैसी
              अटल थी। वह दौर हमार पररवार क मलए मकसी गहरी अधेरी सुरंग जसा था। मुझ  े
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              याद है, जब भी मैं और ममता उनसे ममलने जाते, उनक चेहर पर एक बनावटी
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