Page 216 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     त्योहारों की वो खनक और भाभी मााँ का दुलार जब भी कोई खास

                                                                   े
              त्यौहार आता—चाहे वो दीपावली की जगमगाहट हो, होली क रंग हों या
              रक्षाबंधन का पमवत्र धागा—हमारा मन टोंकखुदष स उडकर सीधे बरदू पहुाँच जाता
                                                     े
              था। भाभी मााँ को पहले से ही पता होता था मक 'अनार और ममता' आने वाले
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              हैं। हमार पहुाँचने स पहल ही रसोई म हमारी पसंद क पकवानों की खुशबू महकने
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              लगती थी।
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                     जस ही हम बरदू की चौखट पर कदम रखत, भाभी मााँ क चेहर पर जो
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              संतोर् और ख़ुशी झलकती थी, वह मकसी ईश्वरीय वरदान स कम नहीं थी। व मुझ  े
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              और ममता को इतना मान-सम्मान और प्रेम देती थीं मक हमें कभी लगा ही नहीं
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              मक हम मकसी दूसर घर म आए हैं। ममता क मलए तो उनका साथ ऐसा था जस  े
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              उस सगी मााँ ममल गई हो। घंटों तक दोनों रसोई म काम करत हुए बात करतीं,
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              हाँसतीं और एक-दूसर स सुख-दुख साझा करतीं। भाभी मााँ का वो बडप्पन ही था
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              मक उन्होंने हम कभी छोटा महसूस नहीं होने मदया, बमल्क हमशा एक वटवृक्ष की
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              तरह अपनी छाया में रखा।
                     अंमतम मवदाई का वो खालीपन आज जब कोई त्यौहार आता है, तो
              बरदू की वो रौनक याद आती है। अब न वो स्नेह भरी डांट है, न वो ममता भरी
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              मनुहार। 10 मदसंबर 2023 क बाद स बरदू का वो घर जस सूना हो गया है। जब
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              भी हम वहां जात हैं, हमारी आख अनायास ही उस कोने को ढूंढती हैं जहााँ भाभी
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              मााँ बठकर हमारा इंतज़ार मकया करती थीं।


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