Page 219 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              प्राण नहीं त्यागे, बमल्क एक परंपरा, एक ममता का सागर और एक मनस्वाथष प्रेम

              का अध्याय समाप्त हो गया।
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                     मर भाई मानमसंह ठाकुर जी क जीवन का वह आधार स्तंभ ढह गया
              मजसने दशकों तक इस घर की गररमा को संभाला था। हमार सात भाइयों क इस
                                                                         े
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              मवशाल पररवार म भाभी मां का स्थान एक कि मबंदु की तरह था।
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                     अंमतम मवदाई का संदेश
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                     भाभी मां, आज आप हमार बीच शारीररक ऱूप से नहीं हैं, लेमकन बरदू
              की हर गली, घर का हर कोना और मेरी हर याद में आप जीमवत रहेंगी। आपका
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              वह मुस्कुराता हुआ चेहरा, वह आशीवाषद देत हुए हाथ और वह मनस्वाथष प्रेम
              हमेशा मेरा मागषदशषन करगा।
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                                ैं
                     ममता और म जब भी अब गांव जाएंग, वह घर हमें थोडा खाली जऱूर
                                                   े
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              लगेगा, लमकन आपकी दी हुई सीख और संस्कार हम हमशा यह अहसास
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              कराएंग मक आप कहीं नहीं गई ं , आप हमार भीतर ही बसी हैं।

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                     "मां कवल जन्म देने वाली नहीं होती, मां वह होती है जो अपनी ममता
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              स पूर क ु ल को सींचती है। रामक ुं वर भाभी मां, आप हमार पररवार की वही 'मां'
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              थीं।"

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