Page 217 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                            ममता की प्रमतमूमतष — भाभी मां की मवदाई


                     हमार पररवार क आंगन का वह बरदू, मजसकी छांव म हम सब पल-  े
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                                                                 ें
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              बढे, उसकी एक सबस मजबूत शाख आज टूट कर मगर गई है। मदनांक 07 जुलाई
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              2025, सुबह क 11 बजे—समय जैसे उस पल मठठक गया। वह हवा, जो हमेशा
              उनक आशीवाषद की खुशबू लकर आती थी, अचानक भारी हो गई। मेरी भाभी
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                                      े
                                                      ें
                                                                 े
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              मां, श्रीमती रामकुं वर बाई, जो मर सात भाइयों म चौथे नंबर क भाई मानमसंह
              ठाकुर जी की धमपत्नी थीं, ने अपनी अंमतम सांस ली।
                            ष
                                                        छुः महीने पहले जब उन्हें
                                                 उस लाइलाज बीमारी ने घेरा, तो
                                                 मकसी ने नहीं सोचा था मक मनयमत
                                                 इतनी मनष्ठुर होगी। वह ममहला जो
                                                   े
                                                 पूर पररवार को अपनी उंगमलयों स  े
                                                 बांधकर रखती थी, खुद धीर-धीर  े
                                                                        े
                                                 मनयमत क हाथों मजबूर होती चली
                                                        े
                                                 गई।
                                                        बरदू की वह स्मृमतयााँ

                                                        जब भी मैं और मेरी पत्नी
                                                 ममता ठाक ु र अपने पैतृक गांव बरदू

                                                 जाने की योजना बनाते थे, तो सफर
                                                 की थकान से ज्यादा मन में भाभी

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                                                                     े
              मां स ममलने का उत्साह होता था। गांव की दहलीज पर कदम रखत ही सबस  े
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              पहल मजनकी ममतामयी नजर हम ढूंढती थीं, व भाभी मां ही थीं।
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