Page 214 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

              मुस्कान आ जाती थी तामक हम तकलीफ न हो। व खुद असहनीय ददष म होती
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                                                                        ें
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              थीं, लमकन हमस हमशा यही पूछतीं—"अनार, स्क ू ल का काम कसा चल रहा
              है? बच्चों की पढाई ठीक है न?"  उनकी बीमारी कवल शारीररक कि नहीं थी,
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              बमल्क हमार धैयष की परीक्षा थी। कई बार रातों को जागकर गुजारना, अस्पतालों
              क चक्कर काटना और उनकी आाँखों में उस लाचारी को देखना हमार कलेजे को
                                                                    े
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              चीर देता था। ममता अक्सर उनक पास बैठकर उनक हाथ सहलाती, और भाभी
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              मााँ मबना कुछ कहे बस उस देखती रहतीं। उस खामोशी म हज़ारों बात होती थीं—
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              एक मााँ जैसी भाभी का अपनी छोटी बहन जैसी देवरानी क मलए अनकहा प्रेम।
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                     संतानों क मलए वटवृक्ष: नीरज, माया, रानू और लमलता भाभी मााँ क
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              मलए उनक चारों बच्चे—नीरज, माया, रानू और लमलता—उनका संसार थे। एक
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              मााँ क ऱूप में उन्होंने उन्हें कवल पाल-पोसकर बडा नहीं मकया, बमल्क उन्हें
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              संस्कारों की उस भट्टी म तपाया जहााँ स व कुं दन बनकर मनकल।
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                  •  नीरज: बेट क ऱूप में नीरज ने मजस तरह अपनी मााँ की सेवा की, वह
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                     आज क समय में ममसाल है। मााँ की एक आह पर उसका दौड पडना,
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                     उनकी दवाइयों का महसाब रखना और उनक अंमतम समय तक साये
                     की तरह साथ रहना—नीरज की आाँखों में मैंने वो डर देखा था जो अपनी
                     मााँ को खोने क ख्याल भर से आता था।
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                  •  बेमटयााँ (माया, रानू और लमलता): तीनों बेमटयों क मलए उनकी मााँ
                     उनकी सबसे अच्छी सहेली थी। भाभी मााँ ने उन्हें मसखाया मक मवपमत्त
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                     में भी कसे धैयष रखा जाता है। बीमारी क मदनों में भी वे बेमटयों को
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                     गृहस्थी और जीवन की सीख देना नहीं भूलती थीं। आज जब म उन्हें
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                     देखता ह ाँ, तो मुझ उनम भाभी मााँ की ही छमव नजर आती है।
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