Page 218 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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                                                                 े
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                     उनक मलए हम महज देवर-देवरानी नहीं थे, बमल्क उनक अपने बच्चों
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                                                          े
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              की तरह थे। उनक हाथ जब मेर मसर पर आशीवाषद देने क मलए उठते थे, तो ऐसा
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              लगता था जैसे साक्षात ईश्वर ने अपना हाथ मेर मसर पर रख मदया हो। उनकी
              दुआओं म वो शमि थी जो शहर की भागदौड म खोए हुए मुझ जस इंसान को
                                                                   ै
                                                                    े
                      ें
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              मफर से अपनी जडों से जोड देती थी।
                     ममता और भाभी मां का ररश्ता तो और भी गहरा था। दो मस्त्यां, जो
              अलग-अलग पीमढयों से थीं, लेमकन प्यार की भार्ा एक ही बोलती थीं। रसोई
                                                        ें
                                                                     े
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                                     ै
              की गपशप हो या आंगन म बठकर की गई पुरानी बात, भाभी मां ने हमशा ममता
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                                         ै
              को अपनी छोटी बहन और बटी जसा दुलार मदया।
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                     दुुःख की घडी और 'अजुन-भीम' का साथ
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                                                                           े
                     भाभी मां अपने पीछ एक भरा-पूरा संसार छोड गई हैं। उनक दो बट,
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              अजुन मसंह ठाक ु र और भीम मसंह ठाक ु र, उनक संस्कारों की जीती-जागती
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              ममसाल हैं। आज जब म उन दोनों को देखता ह ाँ, तो मुझ भाभी मां क धैयष और
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              परवररश की झलक मदखाई देती है। अजुन और भीम ने अपनी मां की सवा म  ें
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                                                                        े
              कोई कसर नहीं छोडी, लेमकन होनी को कौन टाल सकता है?
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                                                                         े
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                     बीमारी क उन अंमतम छह महीनों म उन्होंने मजस साहस स ददष को झला,
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              वह उनकी आंतररक शमि को दशाषता था। वह कमजोर पड रही थीं, लेमकन
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              उनका चेहरा तब भी चमक उठता था जब वह पररवार क सदस्यों को अपने
              आसपास देखती थीं।
                     एक अपूरणीय क्षमत
                                                                       े
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                     07/07/2025 की वह सुबह हमार पररवार क इमतहास का सबस काला
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                                                        ें
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              पन्ना बन गई। सुबह 11 बज जब उन्होंने अपनी आंख मूंदीं, तो मसफ एक देह ने
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