Page 215 - आनंद से अनार तक
P. 215
े
आत्मकथा -आनंद स अनार तक
वो अंमतम मवदाई: 10 मदसंबर 2023 रमववार का वो मदन, जो अमूमन
सुकून का मदन होता है, हमार जीवन का सबस अशांत मदन बन गया। जब खबर
े
े
े
ें
आई मक भाभी मााँ अब इस संसार म नहीं रहीं, तो जस पूर टोंकखुदष की हवा म ें
ै
े
एक भारीपन आ गया। भाई साहब गजराज मसंह जी को देखना सबसे कमठन था;
े
उनक जीवन की आधी शमि जैसे अचानक छीन ली गई हो।
ममता का रो-रोकर बुरा हाल था। वह बार-बार यही कहती—"अब मुझ
े
े
मााँ की तरह कौन डांटगा? कौन लाड लडाएगा?" उस मदन घर का चूल्हा नहीं
ें
जला, क्योंमक घर की अन्नपूणाष ही मवदा हो गई थी। उनकी अंमतम यात्रा म उमडा
जनसैलाब इस बात का गवाह था मक उन्होंने कवल अपने पररवार को ही नहीं,
े
े
बमल्क समाज क हर व्यमि को अपने प्रेम से जीता था।
एक अंतहीन याद भाभी मााँ, आप भले ही 10 मदसंबर को हम छोडकर
ें
चली गई ं , लेमकन घर की हर दीवार, रसोई की हर खुशबू और बच्चों की हर
े
ै
मुस्कान म आप जीमवत हैं। ममता और म आज भी जब अकल बठत हैं, तो
ैं
े
ें
े
े
आपकी बातें मछड ही जाती हैं। आपकी कमी एक ऐसा घाव है जो वि क साथ
भर तो जाएगा, पर उसका मनशान ताउम्र बना रहेगा।
बरदू की यादें और त्योहारों का वो स्नेह
बरदू स टोंकखुदष: दूररयां जो मदलों को और करीब ल आई ं हमारा बसेरा
े
े
े
टोंकखुदष में था और भाभी मााँ अपने पररवार क साथ बरदू में रहती थीं। भौगोमलक
े
ऱूप से हमार बीच फासला जऱूर था, लेमकन भावनात्मक ऱूप से हम हर पल
े
े
एक-दूसर स जुड रहत थे। आज जब म पीछ मुडकर देखता ह ाँ, तो बरदू की वो
े
े
ैं
े
गमलयां और भाभी मााँ का वो घर मसफ ई ं ट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बमल्क मेर े
ष
मलए ममत्व का तीथष स्थल लगता है।
205 | P a g e

