Page 212 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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                          ममता की प्रमतमूमतष—भाभी मा का महाप्रयाण

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                     प्रस्तावना: एक ररिता जो कभी नहीं भरगी जीवन क सफर म कुछ
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                                                                        ें
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              ररश्त खून क नहीं, बमल्क आत्मा क होते हैं। मेरी आत्मकथा क पन्नों में जहााँ
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              संघर् और उपलमब्धयों की गाथा है, वहीं एक पन्ना ऐसा भी है जो आसुओं स  े
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              भीगा हुआ है। यह कहानी है मरी बडी भाभी, मेरी 'भाभी मााँ' श्रीमती तजकुं वर
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              बाई ठाकुर की। व कवल मर बड भाई गजराज मसंह ठाकुर जी की धमपत्नी नहीं
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              थीं, बमल्क इस पररवार की वह धुरी थीं, मजसक इदष-मगदष हम सबका मवश्वास
              घूमता था।
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                     वो मनस्वाथष प्रेम और ममता मुझ आज भी याद है, जब भी मैं और मेरी
              पत्नी ममता ठाकुर घर जात, भाभी मााँ की आाँखों में एक अलग ही चमक आ
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                                             जाती थी। उनका प्रेम मदखावे का नहीं,
                                             बमल्क समपषण का था। उन्होंने हमें कभी
                                             देवर-देवरानी नहीं, बमल्क अपने बच्चों
                                             की तरह माना। ममता (मेरी पत्नी) और
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                                             उनक बीच का ररश्ता तो ऐसा था जैसे
                                             दो सहेमलयां हों या मााँ-बेटी। रसोई की
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                                             चौखट स लकर आगन की धूप तक,
                                             उनकी  मौजूदगी  हर  जगह  एक  सुरक्षा
                                             कवच की तरह महसूस होती थी।
                                                     संघर्ष और बीमारी का वो दौर

              ईश्वर की परीक्षा भी बडी कमठन होती है। भाभी मााँ, जो सबको संभालती थीं,
              स्वयं एक लंबी और किकारी बीमारी की चपेट म आ गई थीं। हमने उन्हें टूटत  े
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              देखा, ददष स जूझत देखा, लमकन उनक चेहर की वो सौम्यता कभी कम नहीं हुई।
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