Page 224 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स  अनार तक
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              था, बमल्क मर उन अनमगनत घंटों की महनत पर प्रशासन की मुहर थी, जो मैंने
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              अपनी छात्राओं क भमवष्य को संवारने म लगाए थे।
              बमटयों क भमवष्य का संकल्प
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                     यह  सम्मान  कवल  'डॉ.  अनार  मसंह  ठाकुर'  का  नहीं  था,  बमल्क
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              शासकीय कन्या उच्चतर माध्यममक मवनॏयालय टोंक खुदष की उन हज़ारों बेमटयों
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              क सपनों का था, मजन्हें मने अथषशास्त् क कमठन मसद्ांतों क साथ-साथ जीवन
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              जीने की कला भी मसखाई।
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                     एक मशक्षक क ऱूप में मेरा हमेशा यह मानना रहा है मक बेमटयााँ कवल
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              एक पररवार की नहीं, बमल्क पूर समाज की धुरी होती हैं। महामारी क उस काल  े
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              दौर से मनकलकर, मडमजटल क्रांमत का महस्सा बनत हुए, आज जब मैं अपनी
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              छात्राओं को तकनीक और ज्ञान क साथ आग बढत देखता ह ाँ, तो मुझ महसूस
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              होता है मक मेरा 'मशक्षक' होना सफल हो गया।
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              अपनों क बीच गौरव
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                     देवास मजला मरा गृह  मजला है। यहााँ क कलेक्टर और एसपी िारा
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              सम्मामनत होना मेर मलए मकसी 'पधॎम' पुरस्कार स कम नहीं था। मंच पर खड होकर
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              जब मैंने सामने जनसैलाब को देखा, तो मुझ अपनी माताजी और मपताजी की
              याद आई। उनकी दी हुई सीख और संघर्ों ने ही मुझ आज इस कामबल बनाया
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              मक म अपने मजल क सवोच्च मंच पर सम्मामनत हो सकू।
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              प्रशमस्त पत्र पर अंमकत शब्द—"मशक्षा मवभाग म उत्कृि कायष हेतु"—मेर मलए
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              एक नई मजम्मदारी की तरह थे। इसने मुझ याद मदलाया मक सफर अभी खत्म नहीं
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              हुआ है, बमल्क टोंक खुदष की हर बटी को सशि बनाने का संकल्प और भी दृढ
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              करना है।

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