Page 229 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

                     मवनॏयालय का आाँगन और वैज्ञामनक चेतना

                     शासकीय कन्या उच्चतर माध्यममक मवनॏयालय टोंकखुदष क गमलयारों में
                                                                  े
                                                                  े
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                   ैं
              जब मने अपनी छात्राओं को जल शुमद्करण क वज्ञामनक तरीक मसखाए, तो
                                                    े
                                                               ैं
                                ें
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                                                                      े
                            ाँ
              उनकी उत्सुक आखों म मुझ भमवष्य का भारत मदखाई मदया। मने उन्हें कवल यह
              नहीं मसखाया मक पानी बचाओ, बमल्क यह भी समझाया मक दूमर्त जल को कस  े
                                                                          ै
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              शुद् रखा जाए और पानी की बबाषदी को रोकना कस एक ईश्वरीय कायष है।
                                                      ै
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                     मेर मलए 'आनंदक' होना कवल खुमशयााँ बााँटना नहीं है, बमल्क आने
              वाल संकटों क प्रमत समाज को सचेत कर उन्हें भमवष्य क प्रमत आश्वस्त करना
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                                                            े
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              भी है।
                     एक आह्वान: जल ही जीवन है
                                                   े
                     इस सम्मान को ग्रहण करते समय मेर मन में एक ही मवचार कौंध रहा
              था— "पानी हमारी मनजी संपमत्त नहीं, बमल्क आने वाली पीमढयों की अमानत
                                                     े
              है।" मेरा लक्ष्य अब और भी स्पि है— टोंकखुदष क हर घर और हर मवनॏयाथी तक
              जल संरक्षण की इस अलख को पहुाँचाना।
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                     जब क्षेत्र क मशक्षामवदों, समाजसमवयों और शुभमचंतकों ने मुझ इस
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              उपलमब्ध पर बधाई दी, तो मुझ लगा मक समाज अब जल की महत्ता को समझने
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              लगा है।
                     "अक्षरों स ज्ञान की प्यास बुझात-बुझात, अब धरती की प्यास बुझाने
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              का व्रत मलया है। क्योंमक जहााँ जल है, वहीं जीवन का कल है।"

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