Page 227 - आनंद से अनार तक
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                                आत्मकथा -आनंद स  अनार तक

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              शुभकामनाओं  ने  यह  अहसास  कराया  मक  मरा  मवनॏयालय  पररवार  मरी
                                                                           े
              उपलमब्धयों को अपनी उपलमब्ध मानता है।
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                     "लेखनी जब समाज क प्रमत जवाबदेह होती है, तभी वह सामहत्य बनती
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              है। तक्षमशला का वह सम्मान मर मलए गंतव्य नहीं, बमल्क एक नई सामहमत्यक
              यात्रा का प्रस्थान मबंदु है।"




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                          भारतीय मशक्षा पद्मत और तक्षमशला सम्मान पर

                "तक्षमशला की उस पावन धरा पर ममला सम्मान, मेरी सरस्वती साधना का
                 प्रमतफल है और 'मवश्वगुरु भारत' क स्वप्न की ओर एक छोटा सा कदम।"
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                  "आधुमनक सूचनाओं क दौर म प्राचीन गुरु-मशष्य परंपरा और मौमलक
                        मशक्षा की आवाज़ उठाना ही मेरी लेखनी का धमष है।"
                                सामहमत्यक यात्रा और संकल्प पर
                 "यह सम्मान पत्र कवल एक कागज़ का टुकडा नहीं, बमल्क टोंकखुदष की
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                                                            े
                 माटी से उपजे उन मवचारों की जीत है मजन्होंने मशक्षा क ह्रास को अपनी
                                      आाँखों से देखा है।"

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                 "तक्षमशला का वह मंच मरा गंतव्य नहीं, बमल्क एक नई सामहमत्यक यात्रा
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                   का प्रस्थान मबंदु है, जहााँ स अब भारतीय मूल्यों की मशाल और तज़
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                                          जलेगी।"


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