Page 196 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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संघर्, मपताजी क जाने क बाद पररवार को संभालने क त्याग और अब अपने
बेट की सबसे बडी सफलता को देखने की संतुमि की थी।
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म तुरंत गाडी स उतरा और उनक चरणों म झुक गया।
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बड बाजा शांत हो गया। भीड म भी एक पल की चुप्पी छा गई। यह
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क्षण कवल मेर और मेरी मााँ क बीच का था।
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मााँ ने अपने कााँपते, स्नेहपूण कर कमलों से मेर मसर पर हाथ रखा और
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आशीवाषद मदया। उन्होंने मेरी पीठ पर धीर से हाथ फरा और उनक मुह स जो
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शब्द मनकले, वे मकसी भी मडमग्रयााँ और उपामधयााँ से बड थे: "बेटा, तुम्हारी
महनत सफल हुई। आज तुम्हार मपताजी जहााँ भी होंगे, उन्हें हम पर गवष होगा।"
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उस पल, मेर सार औपचाररक सम्मान—मदल्ली का मंच, अमृतसर की
शांमत—सब गौण हो गए। माताजी का आशीवाषद ही मेरी पीएचडी की असली
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उपामध थी। मर भाई और मर दोस्त भी भावुक हो गए। हमने महसूस मकया मक
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यह मवजय कवल पुस्तकों की नहीं, बमल्क जीवन क मसद्ांतों की मवजय थी।
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स्नेह भोज और सामूमहक उल्लास
शाम होते-होते, मेर भाइयों िारा आयोमजत स्नेह भोज का समय हो
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गया। यह गााँव म एक बडा सामूमहक भोजन था, मजसम सभी भाई, माताजी, ममत्र
और ररश्तेदार शाममल थे।
भोजनशाला में, मैंने एक साधारण-सी चौकी पर बैठकर अपने भाइयों
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और दोस्तों क साथ भोजन मकया। यह भोजन, जो प्रेम और अपनेपन से पकाया
गया था, दुमनया क मकसी भी शाही पकवान से ज़्यादा स्वामदि था।
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टबल पर बातें चल रही थीं—बड भैया सज्जन मसंह बता रहे थे मक कसे
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उन्होंने और मानमसंह ने ररश्तदारों को आमंमत्रत मकया। मवक्रम मसंह और गजराज
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