Page 192 - आनंद से अनार तक
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आत्मकथा -आनंद स अनार तक
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आत्मा कथा का महाकाव्य: बरद गाव में डॉक्टर का
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राज्यामभर्ेक
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(यह कहानी मरी यात्रा का वह अंमतम और सबस मीठा पडाव है—वह
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क्षण जब मदल्ली क भव्य सम्मान का वास्तमवक अथष मरी जन्मभूमम, मेर गााँव
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बरदु की पावन माटी म आकर पूण हुआ। यह कवल एक जुलूस या भोज नहीं
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था, यह मेर भाइयों, मरी माताजी और पूर गााँव क सामूमहक प्रेम और अटूट
मवश्वास का 'हर्ोल्लास का सैलाब' था।)
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लौटना—साहस की यात्रा से प्रेम क आाँगन तक
21 मदसंबर 2018, सुबह, मध्य प्रदेश की ओर: अमृतसर की
आध्यामत्मक शांमत और देशप्रेम की ऊजाष (मजसका हमने 19 और 20 मदसंबर
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को अनुभव मकया) अब हमार साथ थी। मदल्ली की उपामध और पंजाब की सीख
को लेकर, हम चारों—म (डॉ. अनार मसंह ठाकुर), मेरा भाई सुमेर मसंह ठाक ु र,
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और मेर दोस्त सुरन्ि सन्धव तथा सोहन क ु मार भैसमनया—अपने पैतृक गााँव बरदु
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क मलए वापस लौट रहे थे।
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रन की सीट पर बैठकर, मैं तीन मदन पहले क 'आनंद मसंह' और आज
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क 'डॉ. अनार मसंह' क बीच क अंतर को महसूस कर रहा था। यह पररवतन कवल
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नाम का नहीं था, बमल्क मजम्मेदारी का था।
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हम चारों थक चुक थे, लेमकन एक गहरी संतुमि थी। हमने सोचा था मक
घर पहुाँचकर हम सीधे अपनी माताजी स ममलग, अपना सामान रखग और शांमत
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से पररवार क साथ बैठकर अपनी उपलमब्ध साझा करग। सुरन्ि और सोहन ने भी
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तय मकया था मक वे मेर गााँव में एक मदन रुककर आराम करगे। हमार मन में घर
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की सादगी और सुकून की कल्पना थी।
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